Salient Points of speech of Union Home Minister & Minister of Cooperation Shri Amit Shah during the special discussion in the Rajya Sabha on the completion of 150 years of 'Vande Mataram'

Press | Dec 09, 2025

केंद्रीय गृह एवंसहकारिता मंत्री श्री अमित शाह द्वारा 'वंदे मातरम्' के 150 वर्ष पूर्णहोने पर राज्य सभा में विशेष चर्चाके दौरान दिए गए संबोधन के मुख्य बिंदु 

 

वंदे मातरम् राष्ट्र के प्रति समर्पण का माध्यम आजादीके आंदोलन में भी था, आज भी है और 2047 में विकसितभारत के निर्माण के समय भी रहेगा


वंदे मातरम्, मां भारती के प्रति समर्पण, भक्ति और कर्तव्य के भाव जागृत करने वाली एक अमर कृति है


'वंदे मातरम्' पर चर्चा से आने वाली पीढ़ियाँ इसके महत्व को समझेंगी, और यह राष्ट्र के पुनर्निर्माण का आधार भी बनेगा


अगर जवाहरलाल नेहरू ने वंदे मातरम् के दो टुकड़े कर तुष्टीकरणकी शुरुआत न की होती, तो देश का विभाजन भी न होता


जिस वंदे मातरम् को गांधी जी ने ‘शुद्धतम आत्मा से निकलाहुआ गान’ कहा, उसी गीत को कांग्रेस ने दो हिस्सोंमें बाँट दिया


वंदे मातरम् के 100 वर्ष पर इंदिरा गांधी ने ‘वंदे मातरम्’बोलने वाले लोगों को जेल में डाल दिया और आपातकाल लगाया


जिस कांग्रेस पार्टी के अधिवेशनों की शुरुआत गुरुदेव टैगोरवन्दे मातरम् गाकर कराते थे, उसी पर जब लोकसभा में चर्चा हुई, तब गांधी परिवार के सदस्य नदारद थे


जवाहरलाल नेहरू से लेकर आज के कांग्रेस पार्टी के नेतृत्वतक, वन्दे मातरम् का अपमान कांग्रेसके खून में रहा है


इस्लामिक व ब्रिटिश आक्रमण से हमारी संस्कृति व इतिहासक्षीण-शीर्ण हुआ, उस वक्त बंकिम बाबू ने वंदे मातरम्की रचना कर, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद को पुनर्स्थापितकिया


‘वंदे मातरम्’ आज भी स्वतंत्रता, संस्कृति और राष्ट्रभक्ति का सबसे शक्तिशाली जयघोष है


‘वंदे मातरम्’ आजादी के आंदोलन में स्वतंत्रता का नाराबना और अब विकसित व महान भारत के निर्माण का भी प्रेरक मंत्र बनेगा


यह हम सभी का कर्तव्य है कि हर बच्चे, युवा व किशोर के मन में वंदे मातरम् के जयघोष के साथ राष्ट्रके प्रति समर्पण और बलिदान के संस्कार जगाएँ


केंद्रीय गृह मंत्री श्री अमित शाह ने आज मंगलवार को राज्यसभा मेंराष्ट्रीय गीत - 'वंदे मातरम' पर चर्चा मेंसदन को संबोधित किया। श्री शाह ने कहा कि यह केवल देशभक्ति का गीत नहीं, बल्कि भारत माता के प्रति भक्ति, समर्पण और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का प्रतीक है।स्वतंत्रता संग्राम में वंदे मातरम ने क्रांतिकारियों और सैनिकों को प्रेरित कियाऔर इसे संविधान सभा द्वारा राष्ट्रगीत के रूप में सम्मान दिया गया। उन्होंनेकांग्रेस पर आरोप लगाते हुए कहा कि वे वंदे मातरम की महिमा को राजनीतिक रूप से कमकरने की कोशिश करते हैं। केंद्रीय गृहमंत्री ने बताया कि वंदे मातरम के 150वें वर्ष के उपलक्ष्य में देशभर में विशेष कार्यक्रम, डाक टिकट, सिक्के, प्रदर्शनी और सामूहिक गान आयोजित किए जा रहे हैं।वंदे मातरम आज भी राष्ट्रनिर्माण और युवा पीढ़ी में राष्ट्रभक्ति जागृत करने कामाध्यम है।

 

श्री शाह ने कहा कि सदन में जब वंदे मातरम पर चर्चा हो रही थी, तब कुछ सदस्यों ने यह प्रश्न उठाया कि आखिर इस विषयपर चर्चा की आवश्यकता क्यों है। वंदे मातरम पर चर्चा और उसके प्रति समर्पण कीआवश्यकता आज ही नहीं, आज़ादी के आंदोलन के समय भी थी और 2047 में विकसित भारत के निर्माण के दौरान भी रहेगी। यहअमर रचना मातृभूमि के प्रति भक्ति, समर्पण औरकर्तव्यबोध जगाने वाली कृति है। जिन लोगों को आज वंदे मातरम पर चर्चा की आवश्यकतासमझ नहीं आ रही, उन्हें अपनी समझ पर पुनः विचार करने की जरूरत है। कुछलोगों को लगता है कि बंगाल में चुनाव आने वाले हैं, इसलिए वंदे मातरम की चर्चा हो रही है। वे इसकी महिमा को चुनाव से जोड़कर कमकरना चाहते हैं। यह सही है कि आदरणीय बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय जी बंगाल में जन्मे, गीत वहीं लिखा गया और आनंद मठ की पृष्ठभूमि भी बंगालकी थी, लेकिन वंदे मातरम का उदय केवल बंगाल तक सीमित नहींरहा। यह पूरे देश और दुनिया भर में स्वतंत्रता सेनानियों की प्रेरणा बना।

 

केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि आज भी सीमा पर देश कीरक्षा करते हुए शहीद होने वाले जवानों के होंठों पर वंदे मातरम ही रहता है। पुलिसऔर सुरक्षा बलों के जवान भी अपने सर्वोच्च बलिदान के समय इसी मंत्र को स्मरण करतेहैं। आज़ादी के आंदोलन के दौरान वंदे मातरम गुलामी की जंजीरों को तोड़ने का स्वरबन चुका था और अनेक क्रांतिकारियों को यह प्रेरणा देता था कि अगले जन्म में भीभारत में ही जन्म लेकर राष्ट्र की सेवा करें। यह गीत पीढ़ियों से लोगों को अपनीसंस्कृति के मार्ग पर चलने और राष्ट्र के प्रति समर्पण की प्रेरणा देता रहा है।संसद के दोनों सदनों में होने वाली इस चर्चा से बच्चे, किशोर, युवा और आने वाली पीढ़ियां वंदे मातरम के महत्व कोसमझ सकेंगी और राष्ट्र पुनर्निर्माण में इसे प्रेरणा स्वरूप अपनाएंगी। 7 नवंबर 1875, कार्तिक शुक्लनवमी के दिन वंदे मातरम का प्रथम सार्वजनिक प्रकाशन हुआ, जिसे अक्षय नवमी या जगद्धात्री पूजा के रूप में जाना जाता है। प्रारंभ मेंइसे एक उत्कृष्ट साहित्यिक रचना माना गया लेकिन धीरे-धीरे यह देशभक्ति, त्याग और राष्ट्रीय चेतना का प्रतीक बनकर आज़ादी केआंदोलन का मार्गदर्शक बना। केंद्रीय गृह मंत्री ने रचना की पृष्ठभूमि को भीमहत्वपूर्ण बताते हुए कहा कि सदियों तक इस्लामिक आक्रमणों का विरोध करने वालीसंस्कृति और फिर अंग्रेजों द्वारा थोपे गए नए जीवन-व्यवहार के बीच, बंकिम बाबू ने इस गीत के माध्यम से भारत की मूलसभ्यता, सांस्कृतिक राष्ट्रवाद और मातृभूमि की उपासना कीपरंपरा को पुनः स्थापित किया।

श्री शाह ने कहा कि उस समय न सोशल मीडिया था, न प्रचार के साधन। उल्टा अंग्रेजी शासन वंदे मातरमबोलने पर प्रतिबंध लगाता था, कोड़े मारता था, जेल में डालता था। फिर भी यह गीत सब प्रतिबंधों को पार करते हुए कश्मीर सेकन्याकुमारी तक फैल गया और भारत की संस्कृति के प्रति श्रद्धा रखने वाले लोगों केलिए पुनर्जागरण का मंत्र बन गया। गुलामी के कालखंड में मंदिर, विश्वविद्यालय, कला केंद्र, कृषि व्यवस्थाएं और शिक्षा प्रणालियां नष्ट की गई, लेकिन भारतीय संस्कृति की आत्मा को कोई कमजोर नहीं करपाया। आवश्यकता केवल उस भावना को जागृत करने की थी, और वही कार्य वंदे मातरम ने किया। यह गीत देशभर में फैलता हुआअंडमान-निकोबार की जेलों तक पहुँचा, जिसे न अंग्रेजरोक पाए न उनके समर्थक। वंदे मातरम ने उस राष्ट्र को पुनर्जीवित किया जिसने अपनीदिव्य शक्ति को भुला दिया था। महर्षि अरविंद ने इसे भारत के पुनर्जन्म का मंत्रकहा और यह भी कहा कि ईश्वर ने देश के लिए आवश्यक इस मंत्र को साकार करने हेतु हीबंकिम बाबू को जन्म दिया। उनका विचार आज़ादी के आंदोलन का नारा बना और पीढ़ियों काप्रेरणा स्त्रोत भी।

वरिष्ठ भाजपा नेता ने कहा कि हमारा देश दुनिया मेंअनूठा है। कई देशों की सीमाएं युद्धों, संधियों याअधिनियमों से बनी हैं, लेकिन भारत की सीमाएं हमारी संस्कृति ने तय की हैं।इसी सांस्कृतिक आधार ने भारत को जोड़े रखा और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का विचारगुलामी के काल में सबसे पहले बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय ने जागृत किया। पूरे देश कोदेखें तो स्पष्ट होता है कि भारत को जोड़ने वाली असली शक्ति हमारी संस्कृति है।यही सांस्कृतिक आधार वह मंत्र है जिसने वंदे मातरम के माध्यम से सांस्कृतिकराष्ट्रवाद की भावना को मजबूत किया। जब अंग्रेजों ने वंदे मातरम पर कई प्रतिबंधलगाए, तब बंकिम बाबू ने पत्र में लिखा कि उन्हें कोई आपत्तिनहीं है यदि उनका पूरा साहित्य नदी में बहा दिया जाए, क्योंकि वंदे मातरम अनंत काल तक जीवित रहेगा। यह गीत लोगों के हृदय मेंस्थान बनाएगा और भारत के पुनर्निर्माण का मंत्र बनेगा। आज यह स्पष्ट दिख रहा है किबंकिम बाबू के शब्द सत्य साबित हुए हैं। देर से ही सही, आज पूरा राष्ट्र सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भावना को स्वीकार कर आगे बढ़ रहाहै। हम सभी भारत माता की संताने मानते हैं कि यह देश जमीन का टुकड़ा नहीं बल्किहमारी मां है और उसी भावना की अभिव्यक्ति वंदे मातरम है।

श्री शाह ने कहा कि वंदे मातरम की रचना में भारत माताके स्वरूप का अत्यंत भावपूर्ण चित्रण किया गया है। इसमें जल, फल और समृद्धि की दायिनी भारत माता का वर्णन है। मनको प्रफुल्लित करने वाली पुष्पों की शोभा भी भारत माता से जोड़ी गई है।  इसमें सरस्वती, लक्ष्मी और दुर्गा के स्वरूप को भारत माता बताया गया है। ज्ञान, समृद्धि और रक्षा की शक्ति भारत माता की कृपा से हीमिल सकती है, इसलिए बार-बार प्रणाम करने की भावना इस गीत मेंव्यक्त होती है। बंकिम बाबू ने दुर्गा की वीरता, लक्ष्मी की संपन्नता और सरस्वती की मेधा को भारत माता का आशीर्वाद बतायाहै। यह विचार भले उन्होंने आज से लगभग डेढ़ सौ वर्ष पहले प्रस्तुत किया हो, लेकिन इसकी जड़ें बहुत प्राचीन हैं। रामायण में भगवानश्री राम ने लंका पर विजय के बाद भी मातृभूमि का त्याग नहीं किया और कहा कि माताऔर मातृभूमि ईश्वर से भी महान होती हैं। आचार्य शंकर और आचार्य चाणक्य ने भीमातृभूमि के महिमा मंडन को सर्वोच्च स्थान दिया और हमारी पहचान को मातृभूमि के साथजोड़ा। वही हमें भाषा, संस्कृति और जीवन को उन्नत करने का अवसर देती है।गुलामी के घने अंधकार में इस चिर पुरातन भाव को बंकिम बाबू ने पुनर्जीवित किया।वंदे मातरम के उद्घोष ने जनमानस में स्वराज की भावना जगाई और गुलामी की मानसिकताको तोड़ने का कार्य किया। महर्षि अरविंद ने वंदे मातरम को गीत नहीं बल्कि भारत कीआध्यात्मिक शक्ति का प्रतीक बताया। बताया कि वंदे मातरम शरीर में ऊर्जा जगाता है, भावनाओं और विचारों को शुद्ध करता है और चेतना कोजागृत करता है। यह केवल देश प्रेम की अभिव्यक्ति नहीं बल्कि भारत माता की दिव्यशक्ति का आह्वान है।

केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि भारत की मूल सनातनचेतना को जगाने का कार्य वंदे मातरम ने किया और इसी कारण स्वतंत्रता आंदोलन केअधिकांश नेताओं ने इसे संघर्ष का आधार बनाया। कई सेनानी जब फांसी के तख्ते पर जातेथे, तब उनके अंतिम शब्द वंदे मातरम ही होते थे। स्वदेशीआंदोलन का आह्वान हो, विदेशी वस्तुओं के बहिष्कार की पुकार हो, राष्ट्रीय शिक्षा का संदेश हो या राष्ट्रभक्ति काउत्साह, हर चरण में इस देश ने वंदे मातरम का उद्घोष सुना औरमहसूस किया। पंजाब के गदर आंदोलन में वंदे मातरम शीर्षक से कई पर्चे बांटे गए।महाराष्ट्र में गणपति और शिवाजी उत्सव के दौरान वंदे मातरम के विशेषांक बेचे औरवितरित किए जाते थे। तमिलनाडु में सुब्रमण्यम भारती जी ने इसका तमिल अनुवाद कियाऔर हिंद महासागर तक क्रांति की चेतना को जागृत किया। 1907 में कोलकाता में वंदे मातरम नाम से एक अंग्रेजी अखबार शुरू हुआ, जिसके संपादक महर्षि अरविंद थे। उन्होंने बताया किब्रिटिश सरकार ने उसे खतरनाक राष्ट्रवादी पत्र माना और महर्षि अरविंद पर राजद्रोहका मुकदमा चलाया गया। उन्हें सजा भी हुई और अंत में पत्र पर प्रतिबंध लगा दियागया। कांग्रेस के अधिवेशनों ने भी वंदे मातरम का सम्मान किया। 1896 में गुरुदेव टैगोर ने इसे पहली बार कांग्रेस अधिवेशनमें गाया और 1905 में वाराणसी अधिवेशन में सरला देवी चौधरानी ने पूर्णवंदे मातरम का गायन किया। 15 अगस्त 1947 को जब देशस्वतंत्र हुआ, तब सुबह पंडित ओमकारनाथ ठाकुर ने सरदार पटेल के आग्रहपर आकाशवाणी से वंदे मातरम का गायन किया। इसी भावना के आधार पर संविधान सभा कीअंतिम बैठक में, अध्यक्ष डॉ राजेन्द्र प्रसाद की अध्यक्षता में, वंदे मातरम को राष्ट्रगान के समकक्ष सम्मान देते हुएराष्ट्रगीत घोषित किया गया।

श्री शाह ने कहा कि बीते दिन कांग्रेस के कई सदस्यपूछ रहे थे कि वंदे मातरम पर चर्चा क्यों की जा रही है और इसे राजनीतिक हथकंडा बतारहे थे। संसद में किसी मुद्दे पर चर्चा करने से हम नहीं डरते। संसद चलने दें तो हरविषय पर चर्चा होगी। वंदे मातरम पर चर्चा से बचने की यह मानसिकता नई नहीं है। यहवंदे मातरम का 150वां वर्ष है और हमारे देश में किसी भी महान रचना केमहत्वपूर्ण वर्ष को सम्मान दिया जाता है। जब वंदे मातरम के पचास वर्ष पूरे हुए, तब देश आजाद नहीं था। 1937 में इसकी स्वर्ण जयंती पर जवाहरलाल नेहरू ने इसे दो अंतरों में सीमित करदिया। यह वंदे मातरम के महिमा मंडन को रोकने की शुरुआत थी और यही क्रम आगेतुष्टिकरण की नीति तक पहुंचा जिसने देश के विभाजन का मार्ग प्रशस्त किया। श्री शाहने कहा कि उनके जैसे कई लोगों का मानना है कि यदि वंदे मातरम को सीमित करने कानिर्णय न लिया जाता तो देश का विभाजन न होता। पचास वर्ष बाद, जब वंदे मातरम के सौ वर्ष पूरे हुए, तब इसके सम्मान की कोई बात ही नहीं हुई क्योंकि देशपर आपातकाल थोप दिया गया था। लाखों विपक्षी कार्यकर्ताओं और समाज सेवियों को जेलमें बंद कर दिया गया। अखबारों पर ताले लगा दिए गए और आकाशवाणी पर कई कलाकारों कीआवाजें बंद कर दी गईं। जब वंदे मातरम 100 वर्ष का हुआ, तब पूरा देश मानो एक बंदी शिविर बन गया था।

केंद्रीय गृह एवं सहकारिता मंत्री ने कहा कि आज वंदेमातरम के 150 वर्ष पूरे होने पर लोकसभा में चर्चा हुई, लेकिन कांग्रेस नेतृत्व के दोनों सदस्य अनुपस्थितरहे। जिस कांग्रेस के अधिवेशनों की शुरुआत कभी गुरुवर टैगोर जैसे लोगों के वंदेमातरम गाने से होती थी, आज वही कांग्रेस इस चर्चा से बचती है। पंडित जवाहरलालनेहरू से लेकर आज के कांग्रेस नेतृत्व तक वंदे मातरम का विरोध उनकी सोच में बनाहुआ है। कांग्रेस की एक प्रमुख नेत्री ने कहा कि वंदे मातरम पर चर्चा की कोईआवश्यकता नहीं है। जिस गीत को महात्मा गांधी ने राष्ट्र की शुद्धतम आत्मा से जुड़ाबताया और जिसे बिपिन चंद्र पाल ने राष्ट्रधर्म की अभिव्यक्ति कहा, उसी वंदे मातरम को काटने का काम कांग्रेस ने किया।कांग्रेस सहित कई विपक्ष दलों एवं उनके नेताओं वंदे मातरम् का अनादर करते हैं जोनिंदनीय है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी वंदे मातरम ने हमारे स्वतंत्रता आंदोलन कोगति दी और विश्व में भारत की राष्ट्रीय चेतना का परिचय कराया। श्यामजी कृष्ण वर्मा, मैडम भीकाजी कामा और वीर सावरकर ने जो भारत कात्रिवर्ण ध्वज बनाया था, उस पर स्वर्णिम अक्षरों में केवल एक ही शब्द अंकित था, वंदे मातरम। 1936 के बर्लिन ओलंपिक में गुलामी के कठिन काल में जब भारतीय हॉकी टीम कोप्रेरणा की आवश्यकता थी, तब कोच ने पूरी टीम को एक पंक्ति में खड़ा करभावपूर्ण स्वर में वंदे मातरम का उच्चारण कराया और टीम स्वर्ण पदक जीतकर लौटी।

श्री शाह ने कहा कि भारतीय जनता पार्टी की स्थापनासांस्कृतिक राष्ट्रवाद की भावना के साथ हुई। पार्टी का मूल विचार यह रहा है किभारत अपनी मूल संस्कृति और मूल विचारों के आधार पर आगे बढ़े, न कि पश्चिमी संस्कृति की दिशा में बहके। इस संसद मेंएक समय वंदे मातरम का गान बंद करा दिया गया था। 1992 में भाजपा सांसद राम नाइक ने अल्प अवधि चर्चा के माध्यम से वंदे मातरम कागान पुनः शुरू करने का विषय उठाया। उस समय प्रतिपक्ष के नेता श्री लालकृष्ण आडवाणीने स्पष्ट रूप से लोकसभा अध्यक्ष से आग्रह किया कि संविधान सभा ने जिसे स्वीकारकिया है उसका गान इस सदन में अवश्य होना चाहिए। इसके बाद लोकसभा ने सर्वसम्मति सेवंदे मातरम के गान की पुनः शुरुआत की। उस समय भी कई सदस्य वंदे मातरम गाने सेइनकार करते थे। श्री शाह ने कहा कि उन्होंने स्वयं देखा है कि कुछ सदस्य वंदेमातरम का गान शुरू होने से पहले ही सदन से बाहर चले जाते थे। आज कहा जा रहा है किकांग्रेस पर झूठे आरोप लगाए जाते हैं, लेकिन वेविश्वास के साथ कह सकते हैं कि भारतीय जनता पार्टी का कोई भी सदस्य वंदे मातरम केगान के समय सम्मानपूर्वक खड़े होने में कभी पीछे नहीं हट सकता। कांग्रेस के जिनसदस्यों ने वंदे मातरम गाने से इनकार किया, उनके नाम वे सदन के पटल पर रखने वाले हैं और अनुरोध करते हैं कि वे इसचर्चा का हिस्सा बनाए जाएं ताकि देश को यह तथ्य ज्ञात हो सके।

केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि बंकिम चंद्रचट्टोपाध्याय की 130वीं जयंती पर डाक विभाग ने विशेष डाक टिकट जारी किया।आजादी की 75वीं वर्षगांठ पर हर घर तिरंगा अभियान के दौरान माननीयप्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने जनता से आग्रह किया कि तिरंगा फहराते समय वंदेमातरम का उद्घोष अवश्य किया जाए। वंदे मातरम के 150 वर्षों को भारत सरकार पूरे वर्ष भव्य रूप से मना रही है। केंद्रीयमंत्रिमंडल ने इसकी रूपरेखा को अनुमोदित किया। राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर परकार्यक्रम निर्धारित किए गए हैं। माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी ने 7 नवंबर 2025 को भारत माता कोपुष्पांजलि देकर इस वर्ष का शुभारंभ किया। इसका पहला चरण नवंबर में पूरा हुआ।दूसरा चरण जनवरी 2026 में, तीसरा अगस्त 2026 में और चौथा नवंबर 2026 में होगा। केंद्रीय सरकार ने स्मारक डाक टिकट औरस्मारक सिक्का जारी किया। उन्होंने बताया कि 75 वादकों द्वारा वंदे मातरम नाद एकम रूप अनेकम शीर्षक से विशेष प्रस्तुतितैयार की गई। 7 नवंबर को देशभर में सामूहिक वंदे मातरम का गान हुआ।इसकी डॉक्यूमेंट्री और प्रदर्शनी प्रत्येक जिला केंद्र और आवश्यकता अनुसार तहसीलस्तर पर प्रदर्शित की जाएगी। उन्होंने कहा कि प्रदर्शनी को डिजिटल माध्यम सेकरोड़ों लोगों तक पहुंचाया जाएगा। आकाशवाणी, दूरदर्शन और एफएम चैनलों पर विशेष कार्यक्रम प्रसारित किए जा रहे हैं।प्रेस सूचना ब्यूरो द्वारा विभिन्न शहरों में चर्चाओं का आयोजन होगा। सभी भारतीयदूतावासों में वंदे मातरम आधारित सांस्कृतिक संध्याएं आयोजित की जाएंगी। वंदेमातरम सैल्यूट टू मदर अर्थ अभियान के तहत वृक्षारोपण कार्यक्रम चल रहा है।राजमार्गों पर वंदे मातरम के इतिहास को दर्शाने वाले भित्ति चित्र लगाए जा रहेहैं। रेलवे स्टेशनों और हवाई अड्डों पर एलईडी डिस्प्ले के माध्यम से घोषणाएं होंगीऔर वंदे मातरम तथा बंकिम चंद्र चट्टोपाध्याय पर पच्चीस एक मिनट की लघु फिल्में भीबनाई जा रही हैं।

श्री शाह ने कहा कि माननीय प्रधानमंत्री श्रीनरेन्द्र मोदी जी ने लाल किले से अमृत काल के लिए पंचप्रण का आह्वान किया जिसमेंविकसित भारत का लक्ष्य, गुलामी की मानसिकता से मुक्ति, अपनी विरासत पर गर्व, देश की एकता और अखंडता की रक्षा और नागरिक कर्तव्य का विस्तार शामिल है।आजादी के 75 वर्ष पूरे होने पर अमृत महोत्सव पूरे देश में मनायागया। गांव-गांव में स्वतंत्रता संग्राम के नायकों को याद किया गया, अनेक अनदेखे योद्धाओं के स्मारक बनाए गए और युवाओं को1857 से 1947 तक के संघर्ष से परिचित कराया गया। अमृत काल केसंदर्भ में माननीय प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी जी ने संकल्प रखा कि आज़ादी कीशताब्दी तक भारत हर क्षेत्र में विश्व में अग्रणी बनेगा। यह किसी एक व्यक्ति या दलका संकल्प नहीं, बल्कि 140 करोड़ भारतीयोंका संकल्प है। दैवयोग से वंदे मातरम के 150वें वर्ष के साथयह संकल्प और अधिक सशक्त होता है, क्योंकि वंदे मातरम ही राष्ट्रभक्ति को पुनः जागृतकरने का माध्यम बनेगा। वंदे मातरम कभी कालातीत नहीं होगा। जिस समय इसकी रचना हुईथी, तब भी इसकी उतनी ही आवश्यकता थी जितनी आज है।स्वतंत्रता संग्राम में जिसने देश को एक किया, वही वंदे मातरम अमृत काल में देश को विकसित और महान बनाने का प्रेरक बनेगा।यह सदन का दायित्व है कि बच्चों और युवाओं के मन में वंदे मातरम की भावना को पुनःस्थापित किया जाए, उन्हें राष्ट्रभक्ति के इस उद्गार की शक्ति समझाई जाएऔर आने वाली पीढ़ी को वंदे मातरम के आदर्शों के अनुरूप राष्ट्रनिर्माण के लिएप्रेरित किया जाए। 

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